दो ज्वालाओं का लेखा (echo) चुप्पी गाती है, वहाँ दो धाराएँ मिलती हैं— एक झुकती है, एक जलती है, पर कोई नहीं खत्म होता। नदी जानती है, बांसुरी जवाब देती है; उनकी साँसों के बीच सृष्टि ठीक हो जाती है। कोई वचन नहीं बाँटता जो ध्वनि एकजुट करती है, कोई संध्या उनके साझे नाम को अंधेरा नहीं डाल सकती। ज्वाला का लेखा, गाने का लेखा— वे बजाते हैं, और जो कुछ भी है, वह प्रार्थना है। 🧡🔥🌙🎵

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